नेपालके संविधान, २०७२ के धारा ३५ से प्रत्येक नागरिकहुकन राज्यसे आधारभूत स्वास्थ्य सेवा निःशुल्क प्राप्त कर्ना तथा कौनोजहन फेन आकस्मिक स्वास्थ्य सेवासे वञ्चित निकर्ना मौलिक हकके प्रत्याभूति कर्गिल बा।
सिंहदरबारके शासकीय अधिकार स्थानीय तहसम पुगैना उद्देश्यके साथ मुलुक संघीय संरचनाम रूपान्तरण हुइल फेन लम्मा समय होगिल बा।
तर, तराईके जिल्लासे सुदूरपश्चिमके विकट हिमाली गाउँसम पुग्क स्वास्थ्य सेवाके धरातल ओर फेन वि.सं. २०४८ सालके पुरान प्रशासनिक संरचना व करार कर्मचारीके भरम टिकल देखाइत।
एकओहर लौव स्थायी दरबन्दी सिर्जना हुइ निसेक्क स्वास्थ्यकर्मीहुक्र वृत्तिविकासके अवसरसे वञ्चित हुइभिरल बाट। कलसे और ओहर प्रशासनिक ढिलासुस्ती व नीतिगत अन्योलसे ग्रामीण नागरिकके स्वास्थ्य अधिकारके प्रभावकारी कार्यान्वयनम चुनौती थपल बा।
क) शासकीय सुधार कार्ययोजना व संघीय ऐनके प्रखल
वर्तमान सरकार सत्ता सम्हल्ना लगत्तै सुशासन व प्रशासनिक सुधारके लाग महत्वाकांक्षी ‘१०० बुँदा शासकीय सुधार कार्ययोजना’ सार्वजनिक करल रह।
उक्त कार्ययोजनाम प्रशासनिक सुशासनके मेरुदण्ड मन्लक संघीय निजामती सेवा ऐन’ ४५ दिनभित्तर लन्ना प्रतिबद्धता उल्लेख कर्गिल रह। तर, विभिन्न कारणवश त्वाकल समयसीमाभित्तर ऐन जारी हुइ निस्याकल।
संघीय छाता ऐन अइना ढिलाइ हुँइना प्रदेश तथा स्थानीय तहके कर्मचारीसम्बन्धी कानुनम आवश्यक स्पष्टता आय स्याकल नि हो। परिणामस्वरूप कर्मचारी व्यवस्थापन तथा लौव दरबन्दी सिर्जनाके प्रक्रिया अपेक्षित रूपम आघ बहड्ना हस नि देखाइत।
ख) संवैधानिक अधिकार व ओएनएमके सकस
संविधानके अनुसूची–८ ले स्थानीय तहहन एकल अधिकारके सूचीअन्तर्गत आधारभूत स्वास्थ्य व सरसफाइके जिम्मेवारी प्रदान कर्ल बा।
सो अधिकारके कार्यान्वयनके लाग स्थानीय सरकार सञ्चालन ऐन, २०७४ के दफा ८३ ले पालिकाहुकनहन आपन कार्यबोझ, राजस्व क्षमता तथा भौगोलिक अवस्थाके विश्लेषण कैक ‘संगठन तथा व्यवस्थापन सर्वेक्षण (O&M Survey)’ मार्फत स्थायी दरबन्दी सिर्जना कर्ना स्वायत्तता देहल बा।
तर, संघीय कानुनके अभाव वित्तीय दायित्वके सीमितताहन कारण देखैती देशभरके अधिकांश स्थानीय तहम ओएनएम सर्वेक्षण ओर पूर्णता पाय नि सेक्ल हो।
ओरओहर, लोक सेवा आयोगमार्फत स्थायी कर्मचारी पदपूर्तिम हुइना ढिलाइके कारण सेवा प्रवाहहन निरन्तरता देह पालिकाहन करार तथा ज्यालादारी जनशक्तिके उपर धिउर निर्भर हुइ बाध्य हुइल बाट। फलस्वरूप जनसंख्या वृद्धि व रोगभारके अनुपातअनुसार स्वास्थ्य संरचना तथा स्थायी दरबन्दीके पुनरावलोकन व विस्तार हुइ नि सेक्ल हो।
ग) सुदूरपश्चिममा ऐन–नियमावली व कार्यान्वयनके चुनौती
संघीय कानुन अइना ढिला हुइलसे फेन सुदूरपश्चिम प्रदेश सरकार स्थानीय तहके कर्मचारी प्रशासन व्यवस्थापनके लाग ‘सुदूरपश्चिम प्रदेश स्थानीय सेवा (गठन तथा सञ्चालन) ऐन, २०८१’ तथा सोही ऐन कार्यान्वयनके लाग सुदूरपश्चिम प्रदेश स्थानीय सेवा (गठन तथा सञ्चालन) नियमावली, २०८२’ जारी कैक सकारात्मक सुरुआत कर्ल बा। कानुनी दृष्टिसे यी महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हो। तथापि, ऐन तथा नियमावली जारी होक फेन हुकनके प्रभावकारी कार्यान्वयन हुइ सेकल नि हो।
साथै, सुदूरपश्चिम प्रदेश लोक सेवा आयोगके कार्यसम्पादनम समेत अपेक्षित गति देखाइल नि हो। नियमावली निर्माण होक फेन स्थानीय तहहन वैज्ञानिक ओएनएम सर्वेक्षण ओराक लौव दरबन्दी सिर्जना कर्ना आवश्यक प्राविधिक सहयोग व स्पष्ट मार्गदर्शनके अभाव देखाइत।
औरओहर, प्रदेश लोक सेवा आयोग स्थानीय तहके स्वास्थ्य सेवाके रिक्त पदम स्थायी पदपूर्तिके प्रक्रियाहन ओर चुस्त, प्रभावकारी व समयबद्ध बनाइक लाग आवश्यक देखाइत, ताकि पालिकाहुक्र लम्मा समयसम जनशक्ति अभावके समस्या झ्याल नापरन।
घ) दरबन्दीके असमानता व करार कर्मचारीके सहारा
दरबन्दी मिलान तथा व्यवस्थापनम देखाइल नीतिगत अन्योलके कारण कञ्चनपुर व कैलालीजस्ता उच्च जनघनत्व हुइल तराईके जिल्लाम स्वास्थ्य संस्थाम बेरम्यनके चाप अत्यधिक बा।
तर दरबन्दी वृद्धि नि हुइलसे सीमित कर्मचारी अत्यधिक कार्यबोझ बहन करपर्ना अवस्था बा। औरओहर, दुर्गम पहाडी जिल्लाम दरबन्दी कायम हुइलसे फेन भौगोलिक विकटताके कारण धिउर पदहन लम्मा समयसे रिक्त हुइल बाट।
स्थानीय स्वास्थ्य संस्थाम सिर्जित यह जनशक्ति अभाव पूर्ति कर्ना पालिकाहुक्र करार कर्मचारीके सहारा लेह भिरल बाट। हाल स्थानीय स्वास्थ्य सेवाम भारी संख्याम जनशक्ति करारके आधारम कार्यरत बाट।
वर्षौंसे महामारी नियन्त्रण, सुरक्षित मातृत्व तथा चौबीसै घण्टा आकस्मिक सेवा जसिन जोखिमपूर्ण अग्रपंक्तिम खतल यी स्वास्थ्यकर्मीहुकनके वृत्तिविकास तथा सेवाके निरन्तरता उपर और अन्योल कायम बा।
संघीय सरकार हालै स्वीकृत दरबन्दीबाहेर करारम कर्मचारी धर निपैना नीतिगत निर्णय कैक करारम कार्यरत स्वास्थ्यकर्मीहुकनके भविष्य केल नि होक, स्वास्थ्य संस्थाके नियमित सेवा प्रवाहसमेत प्रभावित हुइना जोखिम बढल बा।
ङ) आबके डगर : कानुनी व व्यावहारिक समाधान
यी नीतिगत तथा प्रशासनिक जडताहन अन्त्य कर्ना तीन्यो तहके सरकार समन्वयात्मक भूमिका निर्वाह कर्ती तत्काल प्रभावकारी कदम चल्ना आवश्यक बा।
१. संघीय ऐनके तदारुकता :
संघीय सरकारल आपन प्रतिबद्धताअनुसार संघीय निजामती सेवा ऐन शीघ्र संसद्बाट पारित कैक स्थानीय तहके लाग स्पष्ट कानुनी आधार तयार करपरी।
२. प्रदेश कानुनके पूर्ण कार्यान्वयन :
सुदूरपश्चिम प्रदेश सरकार जारी कर्लक ऐन तथा नियमावलीके मर्मअनुसार सक्कु पालिकाम वैज्ञानिक ओएनएम सर्वेक्षण अनिवार्य रूपम सम्पन्न कराइक लाग आवश्यक समन्वय, प्राविधिक सहयोग व अनुगमन करपरी।
३. प्रदेश लोक सेवाके सुदृढीकरण :
प्रदेश लोक सेवा आयोग आपन कार्यप्रणालीहन थप प्रविधिमैत्री, पारदर्शी व चुस्त बनैती रिक्त पदहुकनके विज्ञापन तथा पदपूर्ति प्रक्रियाहन द्रुत मार्ग (Fast Track) म सञ्चालन करपरी।
४. कर्मचारीमैत्री तथा क्षेत्रविशेष व्यवस्था :
विकट जिल्लाके लाग स्थानीय जनशक्तिहन प्राथमिकता देना नीति अवलम्बन करपरी। साथै, लम्मा समयसे सेवा कर्तीरहल करार स्वास्थ्यकर्मीहुकनके अनुभवहन उचित मूल्याङ्कन हुइना कैक कानुनी व्यवस्था व अवसर सुनिश्चित हुइ परथ।
अन्तत: नागरिक स्वस्थ निहुइत सम मुलुकके समृद्धि व संघीयताके संस्थागत विकास सम्भव निहुइ। राज्य यी मनन कर्ना जरुरी बा कि स्वास्थ्यकर्मी सुरक्षित, सन्तुष्ट व उत्प्रेरित निहुइत सम आम नागरिक गुणस्तरीय तथा सुरक्षित स्वास्थ्य सेवा प्राप्त कर निसेकही।
स्वास्थ्यकर्मीके वृत्तिविकास व अधिकार प्रत्यक्ष रूपम नागरिकके बाँच्न पइना मौलिक हकसे जुरल विषय हो।
तराईके जिल्लाम देखाइल अत्यधिक कार्यबोझ व पहाडी जिल्लाम रहलक दरबन्दी रिक्तताके समस्या कौनो भौगोलिक नियति नि हो; यी तिन्यो तहके सरकारबीचके समन्वय अभाव तथा प्रशासनिक कार्यसम्पादनम देखाइल सुस्तताके परिणाम हो।
केवल कानुनी दस्तावेज निर्माण कैक केल जनस्तरम सुशासनके अनुभूति कराय नि सेक्जाइ। ओकर लाग अग्रपंक्तिम खत्ना स्वास्थ्यकर्मी राज्यसे न्याय व सम्मान प्राप्त कर परथ, साथै भुइँतहके नागरिक सर्वसुलभ गुणस्तरीय स्वास्थ्य सेवाके सुनिश्चितता महसुस कर पाय परथ।
आब फेन सरकारहन कानुनी तथा व्यावहारिक उत्तरदायित्व बोध कर्ती कर्मचारीमैत्री दरबन्दी’व‘जनमैत्री सेवा प्रवाहके लाग वैज्ञानिक ओएनएम सर्वेक्षण तथा स्थायी पदपूर्तिके ठोस कदम चाल ढिलाइ नि कर परथ।
लेखक – मानबहादुर चन्द
सचिवालय सदस्य, नेपाल स्वास्थ्य प्राविधिक संघ, केन्द्रीय कार्यसमिति